Last updated: July 7th, 2026 at 06:43 am
not-just-an-illness-but-an-epidemic-this-disease-is-spreading-rapidly-in-india-affecting-everyone-from-children-to-the-elderlyभारत में लिवर की महामारी और टाइप-2 मधुमेह जैसी बीमारियां अब पहले की तुलना में बहुत कम उम्र में सामने आ रही हैं, जिससे यह चुनौती महज एक चिकित्सा समस्या से कहीं अधिक बड़ी हो गई है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (आईएलबीएस) में लिवर एंड मेटाबोलिक डिजीज नेटवर्क (इनफ्लीमेन) की तीसरी वर्षगांठ के अवसर पर कहा कि भारत में लिवर की महामारी और टाइप-2 मधुमेह में तीव्र वृद्धि एक व्यापक चयापचय (मेटाबोलिक) संबंध का हिस्सा है, जिसमें फैटी लिवर, उच्च रक्तचाप, रक्त में लिपिड के असामान्य असंतुलन (डिस्लिपिडेमिया) और इंसुलिन प्रतिरोध जैसे विकार आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं और एक दूसरे के लिए जोखिम कारक हैं। उन्होंने कहा कि भारत में चयापचय संबंधी रोगों के महामारी विज्ञान में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहा है। जो बीमारियां पहले मुख्य रूप से मध्यम आयु वर्ग और बुजुर्ग आबादी से जुड़ी थीं, वे अब युवा वयस्कों और यहां तक कि किशोरों में भी तेजी से पाई जा रही हैं।
उन्होंने कहा कि इस बदलते रोग स्वरूप को देखते हुए, उपचारात्मक स्वास्थ्य देखभाल से हटकर रोकथाम, शीघ्र निदान और जीवनशैली में बदलाव की ओर अग्रसर होना आवश्यक है। डॉ. सिंह ने कहा कि देश की आनुवंशिक प्रवृत्ति, केंद्रीय मोटापे की उच्च व्यापकता और विशिष्ट भारतीय शारीरिक बनावट के कारण यहां की आबादी मधुमेह, फैटी लिवर और हृदय रोगों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है। शरीर का सबसे प्रतिरोध क्षमतापूर्ण और पुनर्जीवित होने वाला अंग होने के बावजूद लिवर अस्वास्थ्यकर खान-पान की आदतों, जीवनशैली संबंधी कारकों, अनियमित नींद के पैटर्न, तनावपूर्ण व्यवहार और पर्यावरण प्रदूषण के कारण लगातार तनावग्रस्त होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि इन रोके जा सकने वाले कारणों का समाधान भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति का अभिन्न अंग होना चाहिए। उन्होंने राष्ट्रीय लिवर बायोबैंक बनाने के लिए आईएलबीएस के प्रयासों का स्वागत किया और अपरिवर्तनीय क्षति होने से पहले लिवर रोग की पहचान करने में सक्षम किफायती प्रारंभिक निदान प्रौद्योगिकियों, सामुदायिक स्तर पर स्क्रीनिंग उपकरणों और स्वदेशी बायोमार्करों के विकास के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह की पहल किफायती, सुलभ और निवारक स्वास्थ्य सेवा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को पूरा करती हैं। डॉ. सिंह ने कहा कि देश का बढ़ता जैव प्रौद्योगिकी तंत्र, जीनोम मिशन और व्यापक जीन अनुक्रमण कार्यक्रम भारत के अनूठे रोग पैटर्न को समझने के अभूतपूर्व अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि जैव प्रौद्योगिकी, जीनोमिक्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में प्रगति सटीक चिकित्सा का मार्ग प्रशस्त कर रही है, जिससे व्यक्ति की आनुवंशिक प्रोफ़ाइल, जीवनशैली और पर्यावरणीय जोखिम के अनुरूप उपचार संभव हो सकेंगे।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि स्वस्थ जनसंख्या विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण का मूल आधार है। उन्होंने कहा कि भारत में मधुमेह और फैटी लिवर रोग के बोझ को कम करना देश की युवा आबादी की उत्पादकता, आकांक्षाओं और क्षमता को संरक्षित करने के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इन प्रयासों की सफलता से न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य मजबूत होगा बल्कि भारत की मानव पूंजी और राष्ट्रीय विकास में भी वृद्धि होगी। इस कार्यक्रम में नीति आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. विनोद पॉल; वैज्ञानिक और शैक्षणिक सहयोग के लिए फ्रांसीसी अटैची डॉ. सिल्वियान पाइड; आईएलबीएस के कुलपति प्रोफेसर मृदुल कुमार डागा; और आईएलबीएस के निदेशक प्रोफेसर शिव कुमार सरीन के अलावा देश भर के प्रमुख चिकित्सक, वैज्ञानिक और शोधकर्ता उपस्थित थे। डॉ. सिंह ने इनफ्लीमेन की अगुवाई करने के लिए प्रोफेसर शिव कुमार सरीन को बधाई देते हुए, इस पहल को एक ऐतिहासिक राष्ट्रीय मंच बताया, जिसमें भारत की सबसे तेजी से बढ़ती सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक का सामना करने के लिए वैज्ञानिक संस्थान, चिकित्सक और शोधकर्ता एक साथ आए।
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